वक़्त का एक पहर जैसे रूठा रूठा सा हो गया उसकी आँख से निकला आँसूं सारी दास्तां कह गया। समंदर को क्या मालूम एक एक बूंद की कीमत सहरा को देखो जो बरसात में भी प्यासा रह गया।