वीरान एक पगडंडी पर अकेला चला जा रहा हूँ मैं एक अनवरत, अंतहीन यात्रा शून्य होना चाहता हूँ मैं ए पथिक ..कहाँ चले हो पूछता है बेचैन मन ये अनंत एक सफर है शून्य भी तो अनंत है आगे रहकर कोई पहचान नहीं पीछे रहने में ही है शान उसकी एक नदी की तरह बहना है मुझे कुछ और नहीं, शून्य होना है मुझे।