सुनो ...
पेडों पर गुलमोहर खिलने लगे हैं ...
तुम भी थोड़ा सा खिल जाओ ...
धरती का दिल सूखा सूखा सा है...
प्यार की बूँदों से इसे भिगाओ ...
कोयल की कुहूक मन में आस जगाए ...
तुम भी कुछ लफ्ज़ कानों में कह जाओ ...
अच्छा लगता बचपन का सावन ...
कागज़ की नाव तुम भी कभी चलाओ ....
आसमाँ की आँखें सूनी सूनी हैं ...
घटाओं की स्याही का काज़ल इन्हें लगाओ ...
बरसात का मौसम है...
मेघों...
बरसों....
अब मान भी जाओ!