दीवार पे चिपके पोस्टर

कभी - कभी लगता है, ज़िन्दगी दीवार पे चिपके पोस्टर की तरह उखड़ जाएगी। और छिपी सतह को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर देगी। फिर तसल्ली भी होती है, यह सोचकर, कि वक़्त ने दीवार पर, पोस्टर पे पोस्टर चिपकाएँ हैं। अगर कुछ उखड़ भी गए, तो कई और सामने आ जायेंगे। दीवार जस की तस छिपी रहेगी, सूनी न रहेगी, आबाद रहेगी। पर हर पोस्टर उखड़ने के बावजूद, अपना एक वजूद, एक खरोंच के तौर पर ही सही, दीवार पर छोड़ जाता है। वो खरोंच हमें दिखाई देता है, कभी-कभी सुनाई भी देता है। हम सोचते हैं, कभी यहाँ कोई पोस्टर रहा होगा, कोई ज़िन्दगी इस दीवार पे भी चिपकी होगी...