याद आये तुम जैसे याद आने लगते है बच्चे घर से बाहर जाते ही जैसे जान लगाकर उड़ती चिड़ियाँ को याद आते है गुलाबी चोंच वाले घोसले जैसे डरी हुई अम्मा के सिरहाने रखा खो जाय हनुमान चालीसा वो टटोलती रहे मिल जाने तक
याद आये तुम चुटकी भर नमक की तरह मुठ्ठी भर शक्कर की तरह एक और रोटी की भूख की तरह खो गई हँसी की तरह आँख में नमी भर याद आये तुम याद रखना समन्दर के बिलकुल किनारे की रेत पर ऊँगली से लिख रही हूँ इन्तजार लहरें मिटा रही है बार बार नाख़ून में भीतर तक भरी रेत बिसबिसाने लगी है तुम्हारे जाते ही देखो न मुझे तुम्हारी याद आने लगी है..... कविता में पकता है मन कच्ची रह जाती है ख्वाहिशें.....