जब भी मेरे ज़हन में मेरे घर का नाम आता है तो वो बचपन वाला घर याद आता है,वो घर जिसे बनाने में बहुत से पैसे लगे थे पापा के और लगे थे हमारे बहुत से सपने।
एक एक दीवार बनी थी तो देखा करते थे हम
उस कच्चे मकान में घण्टों खेला करते थे।
चौखट रखी थी मैंने उस मकान की
बड़ी बेटी जो थी घर की।
उस बेरंग से मकान में जब रहने लगे थे तो ताज़महल से भी प्यार लगता था वो।
आज भी सब वैसा ही दिखाई देता है याद में।
एक एक दिन आज भी याद है बचपन का और एक भी पल उस घर से अलग नही।
छोटे से बडे हुए सब अपने रास्तों पे निकल पड़े।
आज किसी और के नाम की तख्ती है उस पे पर दिल मे मेरे आज भी मेरा मकान है वो।
मेरा मकान मेरा घर।हमारा घर।


