याद तो होगा तुम्हें
चला आया था,
तुम्हारी दहलीज़ पर
जनम जनम की प्यास लिए
तुम्हारे दरस की....
और, तुमने खोले नहीं
अपने मन के किवाड़.....
लंबी इंतज़ारी के बाद
जब से लौटा हूँ,
तुम्हारे दर से
बावरा हो गया हूँ मैं
तुम्हारी एक झलक
पाने के लिए.....
और, अपने बावरेपन में
खटखटाने लगा,
किसी भी दरवाज़े को
लगा....
वहीं मिलोगी तुम मुझे
और.... पहचान लोगी....
मेरी तड़प को
लेकिन,
इस पागलपन का नतीज़ा है
कि ठोकरें हीं मिलीं मुझको
हर दर से....
सभी ने उड़ाया मज़ाक
मेरी प्यास का
जो तुमने बोई थी
मेरे दिल की बंज़र ज़मीन पर
अब फैल गई है,
नागफनी के काँटों की तरह
पूरे बदन पर.....
ये ख़लिश,
तुम्हारे नाम की
भटकाती है मुझे
दर-ब-दर
तुम्हारी तलाश में
खाने को ठोकरें
हर दर से....
होने को संगसार
हर चौराहे पर....
तुम्हारी वजह से
हुआ है रुसवा
मेरा प्यार....
सब दोष तुम्हारा है.....
क्यूँ नहीं खोला था,
तुमने,
अपने का किवाड़.... ?


