पापी पेट हाथों मजबूर थे,
चंद रोटि के लिए मोहताज थे
2 जून के लिए भटकते रहे इधर-उधर।
काल भी मुझसे ना हुआ कभी पृथक।
कोरोना से बचूं तो रोटी छूट जाए।
ट्रेन पकड़ने जाऊं तो रोटी छूट जाए।
इसी रोटी के लिए घर छोड़कर इतनी दूर गए थे
और इसी रोटी के साथ घर लौट रहे थे...
रोटी तो यहीं रह गई
पर हमेशा के लिए यह दुनिया ही छूट गई!
उस मृतक की ओर से समर्पित :--रोटी उन्हीं को मुबारक जो राजनीतिक रोटियां सेकते रहे।


