चंद लफ्ज़ो में एक खामोश ग़ज़ल कह डाली

सोते रहे सब लोग ,औऱ हमने जागने की आदत बदल डाली

सुना है चांद भी धरती पे आता है एक पहर को

वहीं मंज़र दिखाने को,दिल की नफ़रत भी बदल डाली

कागजों के ढ़ेर में ,वो अपनी आपबीती छिपाई थी

बड़े मुश्किल से ढूंढा उसे, औऱ अपनी शायरी में बदल डाली