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कर्ज़- ए -मोहब्बत


असल में! मेरी मोहब्बत में सहूलियत बहुत थीहर इक दौर में, उसको रियायत दे रखा था

क्या पता था ! कि इतने खुदगर्ज निकलेंगेमेरी मोहब्बत,किसी गैर को कर्ज दे रखा था

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