देखो तुम मुझे गलत मत समझना

तुम्हें जानने मैं आया हूँ

न कि तुमसे दिल लगाने आया हूँ

बात बस मेरे खोए हुए सरस की है

ना ही ये उसके समझ की थी, ना तेरे समझ की है

अपनी मंज़िल को मैं रास्ते में ढूंढने आया हूँ

सहजता जितनी उसमें थीं उतनी तुझमें पाया हूँ

अब तुझे दायरे में रखना है या नही ,ये उसके समझ की है

वो सपने में रोज़ आती है

औऱ एक ही बात समझती है

ना मिलेगा मुझ सा कोई

औऱ थोडी सी मुस्कुराती है

औऱ इक थप्पड़ लगा चली जाती है

उसके बाद मैं रातों को जग जाया करता हूं

उसको खुली आंखों से समझाया करता हूं

बग़ल में सोई हुई मेरी माँ की नींद में ख़लल पड़ता है

वो पूछ बैठती है वहीं डरा ना जहाँ जंगल पड़ता है