जान दरिया की थी

फ़रमान एक क़ाबिल सुना गया

नाव की खोज में दरिया

अपने ही शाहिल पे आ गया

किनारों के शौकीन आज

बीच मझधार,पाने चले है

जिन्हें तैरना भी नही आता

वो बड़खुरदार ,बचाने चले है

 मैं तो समझता रहा कि डूबने 

से दरिया को पाया जा सकता है

मगर वो तो हमें निगल जाने के लिए खड़े हैं

आज दरिया कहता है कि मुझे इनाम चाहिए

शाहिल के बदले मुझे किसी की जान चाहिए

गिनती के शख्स बैठे थे, इक मझधार में 

डूबने की बारी तब आई जब

दो युगल डूबने लगे थे प्यार में