लड़की!
न थकना न रुकना,
लड़ना, उन सभी चीज़ों से जो रोकती हैं
टोकती हैं तुम्हें
कुछ नया करने पर।
उड़ना, उन सभी परंपराओं से ऊपर
जो गिराना चाहती हैं तुम्हें आसमानों से।
बढ़ना, बिना डरे बिना सहमे
उन सभी रास्तों पर
जहां खौफ़ बिछाया गया है।
तुम अकेली कहाँ हो,
तुम में क़ायनात बस्ती है।
जहाँ पांव तुम्हारे पड़ते हैं,
वहां से जीवन चक्र शुरू होता है।
तुम्हारे आंसुओं की हर बूँद समंदर है,
आंखों में है तो शांत नीला खूबसूरत,
छलके तो सुनामी है, बस्तियां उजाड़ दे।
संवरना, उन सभी मुश्किलों को हरा कर
जिनसे तुम्हें डर लगता है।
तोड़ना, उन बेड़ियों को
जो तुम्हारे पांव में
इज़्ज़त के नाम पे डाली गई हैं।
तुम्हारी मुस्कान, वो हरियाली है
बंजर को भी बहिशतों सा खुशनुमा बाग़ बना दे।
हंसना, तुम पे हंसने वाले लोगों पर
जो नहीं चाहते तुम खुश रहो।
~हिलाल हथ'रवी


