इश्क़ हो जाये किसी को तो फ़िर क्या कीजिये
बस इतना कीजिये कि उसके हक़ में दुआ कीजिये
ये कोई लौ-ए-चराग़ नहीं जो यूँ ही बुझ जाएगी
इश्क़ की आग है ज़्यादा न हवा कीजिये
महबूब की हाँ में हाँ मिलाना ही सिर्फ इश्क़ नहीं,
जिस सम्त कहे रब उसी सम्त बहा कीजिये
मिले हम को भी तुम को भी बावफ़ा कोई
एक दूजे के हक़ में बस इतनी सी दुआ कीजिये
~हिलाल हथरवी

