रुको, ज़रा मुझे मोहलत दो
आज की शाम,
मुझे तुमसे कुछ कहना है,
आज की शाम।
फैसला जो हो तुम्हारा
मंज़ूर होगा,
बयां करने दो हालात सारे
आज की शाम।
तुमसे बिछड़ने का ख़्याल है
और ये मैं बदहवास,
चश्म-ए-नम है और हिलाल उदास
आज की शाम
तुम्हारे इश्क़ की डोर से बंधी हैं मेरी सांसे,
तुम्हारे जाते ही उखड़ जाएंगी सांसे
आज की शाम।
रुको, ज़रा मुझे मोहलत दो
आज की शाम।
~हिलाल हथ'रवी


