
My Historical Poem...!!!
हुस्न चाहें ताज का हो
या फिर मुमताज़ का हो
कुछ इमारते कयामत
तक खण्डहर नही होती
कशिश तो मोहब्बत की
हर एक दौरे में जवान होती
पर कोशिश शाहजहाँ की
ता-क़यामत तक जवाँ रहेंगीं
ताज़ जैसी आलीशान याद
बनाने पर भी हाथ काँटे गए
तौहीन शिल्पकारों की कला
कि या पागल शाहजहाँ की
Read More! Earn More! Learn More!
