ज़हन दर-ब-दर भटकता है इबादत के वक्त
क्या जवाब दूगाँ खुदा को आखिरत के वक्त
वक्त-ए-महशर में जब हिसाब-ओ-किताब होगा
मेरा भी सर हया से झुक जाएगा मगफिरत के वक्त
तमाम-उम्र रही कौम, गुनाहों में मुबतला
आप ही रो पड़े बख्शीश-ए-उम्मत के वक्त
अगर्चे रब्त कितने भी रख लो इंसानों से
याद खुदा ही आता है मुसीबत के वक्त
इस जहान में तो हम मिल ना सके "अयान"
इंशाअल्लाह मिलेगें जरूर कयामत के वक्त
Ayan_saab

