के मेरी जान ना लेले, रुख से सरकना नक़ाब का
बड़ी फुर्सत से तराशा है मुजस्समा हुस्नों शबाब का
तू हंसती है तो खिलते हैं जन्नत के मोती
मैं तुझे गुनगुना लेता गर तू ग़ज़ल होती
तेरे होंठ गुलाब की कलियां
हुस्न छलकता जाम शराब का
के मेरी जान ना लेले, रुख से सरकना नक़ाब का
अश्क़ फ़तेहपुरी

