"हवा का रुख"


अगर चेत जाते,कुछ कर हम गुजर आते।

हवाओं का रुख गर थोडा भी हम समझ पाते।

तो ना दिखती ये धधकती शमसाने

ना दिखती कब्रो की उधवारे ।

तैरती हुई लाशें,ठहरती हुई सांसे 

अपनों को बचाने की जद्दोजहद और उनकी टूटती हुई आसे।

वो सड़कों पर फैली सन्नाटे की चादर, वो चीखते लोग और दूर सुनाई देती सिसकियाँ।

 मन्दिरों की बन्द कपाट ,मस्जिदो की अजानो की चुप्पी और ठहरी हर ओर आजवाये ।

चलो ढूंढ़ लाये वो पुरानी हलचल, वो सड़को पर मचलना और बिना घबराये एक दूसरे से लिपट जाना।

वो बाजारों की रौनक, लोगों की आवाजों की खनक,मुस्कुराते चेहरे जिनपर ना हो मास्क के पहरें।

 कोशिश करे हो हर मुश्किल आसान।

दूर हो कोरोना और छायेँ खुशियों के बादल "शाह" पूरा आसमान।

जीवन का ऐसा सच याद हमेशा है रखना 

करके कोई लापरवाही खो ना दे हम जीवन का सपना।। 


शाहनवाज "शाह"