
उन्मुक्त विचरते नभ-थल में
अंदाज हैं इनके मतवाले ।।
कोमल, पर काबिल पंखों से
आकाश को नीचा कर डालें ।।
है छोटी इनकी परवाजें
पर ये जिद्दी, न रुकते हैं ।।
छोटी-छोटी कोशिश करके
मापन धरती का करते हैं ।।
न कभी रुके, न मोह करें
नित, प्रतिपल मेहनत करते हैं ।।
जितने में इनका पेट भरे
उतना ही दाना चुगते हैं ।।
न तनिक विलंब करें प्रतिदिन
दिनकर के साथ निकलते हैं ।।
धीरे-धीरे, उड़ते रहते
मंजिल पर आकर रुकते हैं ।।
पर हम इंसान, हैं पढ़े-लिखे
न इनसे सबब ये लेते हैं ।।
फैले उजियाला भू-अम्बर
तब तक बिस्तर में रहते हैं ।।
ये पक्षी यूँ तो छोटे पर
है इनकी सोच बड़ी हमसे ।।
हम बुद्धिमान लड़कर खाएँ
पर ये दाना चुगते मिलके ।।
अपनी ऐसी फितरत है, कि
एक दूजे का हक, ले लेते ।।
पर इनकी सोच जरा देखो
अपने हिस्से का ही खाते ।।
ना इनकी ऐसी आदत है
कि, खून करें रोजी के लिए ।।
अपनों का घोंट गला देवें
रुपये के कुछ नोटों के लिए ।।
हम हैं ज्ञानी, पोथी है पढ़ी
जो प्रेम करे, पंडित होवे।।
पर प्यार मिला न कहीं मुझको
हर द्वार सिसकियाँ, जन रोवे।।
जब झुंड में पक्षी उड़ते हैं
कितना मन मोहक दिखते हैं ।।
होकर कतार, करतब करते
सौहार्द की बारिश करते हैं ।।
पर हम मानव, जो सभ्य, शिष्ट
जब झुंड में कभी निकलते हैं ।।
बिन मौत के, मौत करे उत्सव
लाशें सड़कों पर सजती हैं ।।
हमने न कभी भी, कहीं देखा
प
