हर तकाजे, वो मुसलसल, आरज़ू लुटाती रही
माँ थी शायद इसीलिए, औलादें रुलाती रही ।
दर्द का हर एक कतरा, हँसते-हँसते था सहा
क्या किया ? फिर भी ये तोहमत,संतानें लगाती रहीं ।
प्रेम के दो बोल, अंतिम पल न उसको दे सके
सूखे होंठों से वो प्रति-पल,लोरियाँ गाती रही ।
त्याग की रंगीनियों को,ओढ़कर पाला हमें
त्याज्य बनकर आखिरी पल,सिसकियाँ लेती रही ।
हम चले हैं, साथ दो गज, पैर पर उकता गए
देने को खुशियाँ मुकम्मल,मीलों वो चलती रही ।
यूँ सलीके से सलामत,वो जहाँ थी दे गई
पर सुकूं से मरने की,उसकी तमन्ना रह गई ।
मानता हूँ पास उसके, दौलतें न थी‘सनम’
पर नजारे-चाह में, उस सी अमीरी न रही ।
हम भले ही जीतकर, दुनिया को कर लें मुट्ठी में
पर ‘सनम’ माँ सी रियासत, अपने आँगन न रही ।
-------@ShashankmY.


