महत्ता बढ़ रही है या मार बढ़ रही है!

लोगों के मन में ख़ालीपन इतना है या मेरे लिये दीवानगी की बोछार बढ़ रही है,

तकलीफ़ों की सिलवटे बया है, या हठों की तार चढ़ रही है.....

ए ज़िन्दगी कभी तो बता, तू मेरे लिए ही इतनी दुखी है?

या हर ज़िन्दगी को तू तार-तार पढ़ रही है?


भिड़ो से गुज़रता हूँ ख़ालीपन को लिए.....

टूटें हुए सपने, और लोगों के तंज को लिए.....


हासियत ए ख़ुद्दारी तो कहती है मौत से मिल आऊ,

पर ए ज़िंदगी घर का बड़ा जो ठहरा, दूसरो को भूखा कैसें छोड़ आऊ.....


बेवजह, बेमतलब, बदहाल जी रहा हूँ,

धीरें-धीरें लोगों पर भार सी रहा हूँ,

जेठ के लूह सी तलवार चल रही है,

पतवार तो है मेरे पास, पर नाव के छेद से धार बढ़ रही है.....


ए ज़िन्दगी कभी तो बता, तू मेरे लिए ही इतनी दुखी है?

या हर ज़िन्दगी को तू तार-तार पढ़ रही है?