चिट्ठियों में लिपटकर किसी के बस्ते में आ गया
कभी जो डाल से टूटा तो गुलदस्ते में आ गया

जो बाग में था तो कितना महंगा था यह फूल
जो बाजार में आया तू कितने सस्ते में आ गया

किस सफर में था किस मंजिल की ख्वाहिश थी 
किस मोड़ पर भटका किस रस्ते में आ गया

तेरी मर्जी तू इनायत कर ना कर
मैं भटकता हुआ तेरे सजदे में आ गया

ऊंचाइयों से इस कदर गिरा हूं आदि
कि सड़क ऊंची हुई तो घर गड्ढे में आ गया