हम हिंद के परिंदे हैं,

उड़ते जाएंगे उड़ते जाएंगे,

जमीन से आसमान तक,

खूब रंग जमाएंगे,

हार ना मानी है हमने,

कुछ मन में है ठाना,

जीवन की जोत जगे,

पैरों में दम रहे,

सपने खाबो के,

हम सच कर दिखलाएंगे,

हम हिंद के परिंदे हैं,

जगह जमीन पर नहीं,

आसमान में भी बनाएंगे।।

सीमा सूद ✍️ स्वरचित रचना,

लुधियाना पंजाब (दोराहा)