कल तुम आई और
छोड़ गई कुछ सवाल।
जो मेरे जेहन में लगातार
घूम रहे हैं, ढूँढ रहे हैं
अपना अस्तित्व
अपना वजूद
क्या सच मे एक औरत का
कोई घर नही होता
या फिर वो बनाती है
स्वयं के ख्वाबों से सजा एक घरौंदा।
क्योंकी अगर किसी भी औरत का
कोई घर नही होता
तो किसी भी बेटी का कोई मायका नही होता।
हाँ ये भी सच है की
यूँही अचानक से उसका नही हो जाता
उसके ख्वाबों का संसार
बहुत ही धीमे धीमे से
वो रखती है नींव विश्वास की
उस पर खड़ी करती है दीवारें
कर्मठता भरी
महोब्बत के मसाले मे लिप्त
नित्य निरंतर उन्हे रंगती है
चाहतों के रंगो से
उन्हे सजाती है उमंगो से
फिर किसी एक कोने मे रख देती है
अपने दिल के अरमान
और घर को सँवार देती है
सभी की चाहतों के अनुसार।
सभी के गूंजते स्वर
कर लेती है
वो उन महोब्बत भरी दीवारों मे कैद
कुछ कुटिल स्वर लौट जाते हैं
अक्सर उससे टकराकर
कुछ हो जाते हैं सदा के लिए कैद
कुछ को वो कुचल देती है पैरों तले
पर हर बात पर ना बिगड़ती है
ना हर बात को सुलझाने की जहमत उठाती है
क्योंकी उसे बिन सीखे ही आ जाता है
दीवारों को घर बनाना।
सीमा एच दहिया 'धृति'


