जीवनसाथी
शब्द ही कितना गहरा है।
फिर भी ना जाने क्यों हो कर एक दूजे का भी
मन पर शंकाओ कुंठाओ का पहरा है।
जाने क्यों चितवन पर छाया
अहम का घना कुहासा है।
जीवनसाथी
शब्द ही कितना गहरा है।
जीवन अथाह समंदर
लहरों सा उठता गिरता पर
विशाल होकर भी
बिन उसके साथ अधूरा है।
लहरों के पार दिन का ढलता सूरज भी
उसके संग ही सुनहरा है।
जीवनसाथी
शब्द ही कितना गहरा है।
जीवन बहती सरगम
हर आने वाला पल
ठंडी रात कभी
कभी शीतल सवेरा है।
कभी उजियारा बगिया सा
कभी मरुस्थल सा घना अंधेरा है।
हाथ पकड़ एक दूजे का ही
सबने जीवन पट पर
नाम अपना उकेरा है।
जीवनसाथी
शब्द ही कितना गहरा है।


