बात बनती नहीं अब
बढ़ती हुई एक आग है
मन के कोने से उठती
एक हसीन ख्वाब है ।

थाम कर एक छोर को
बढ़ चलें उस ओर को
दिख रही लौ जीत की
हौसलों से प्रित की।

जल उठी है आज फिर
गर्म हो बह रही रूधिर
हृदयतल में धधकती
जीत की दावानल दहकती।

मोड़कर सब रास्ते
बस लक्ष्य को संवारते
उद्देश्य अपना पूर्ण हों
राह कितने भी जीर्ण हों।

संकल्प जो मन में किया
जलती रहे बस वो दिया
बुझने न देंगे लौ आस की
गम नहीं कोई परिहास की।

निशाना अपना हो सटीक
बनकर एकता का प्रतीक
करना है पूर्ण हर लक्ष्य को
अंगीकृत कर प्रत्यक्ष को।

सीमा आजाद