अंदरखाने उठते कुछ तुफान हमें ताडने लगे है हम अब याद-ए-निगार कसकर आढने लगे है!! मुंतजिरी की अदायगी का जिम्मा है सर हमारे और लोग हमे मगरूर कहकर छोडने लगे है!! हर गम से मुखातिब होने का शौक चढा है यूं भी हम जिंदगी की हर तह खोलने लगे है!! राह-ए-हयात का साथी मुसाफिर मेरा कोई नही खामोशी से आजिज होकर रस्ते ही बोलने लगे है!! आदत - ए - गम मे इतने गहरे डूब चुके है फूल भी हमे पैरो मे शूल से चुभने लगे है!! गैरो से क्या उम्मीद लगाते हो तुम 'नेमत' हमनशीं ही जब तुमसे मुंह मोडने लगे है!!