
अंदरखाने उठते कुछ तुफान हमें ताडने लगे है
हम अब याद-ए-निगार कसकर आढने लगे है!!
मुंतजिरी की अदायगी का जिम्मा है सर हमारे
और लोग हमे मगरूर कहकर छोडने लगे है!!
हर गम से मुखातिब होने का शौक चढा है
यूं भी हम जिंदगी की हर तह खोलने लगे है!!
राह-ए
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