मिरे तिमिर-ए-तंहाई मे इक आफताब आया है, चंद लम्हे बख्सने हमको इक मेहरबान आया है।   ताउम्र के लिए सजा लूँ उस मुनव्वर को दिल मे, देखकर उसको ज़ेहन मे ये ख्याल बार-बार आया है।   आलम-ए- बेतरतीब ठहर-सा गया है शहर मे, सुना है इक अमन परस्त हवा का झोंका आया है। फूल खिले हैं रंग-बिरंगे हर डाल पर, लौटकर बगीचे मे इक माली पुराना आया है।