उसको आदमी मे मजहब नजर आता है, मुझको तो हर किसी मे इंसान नजर आता है। आदमी क्या वो तो जबान तक बाँट देता है, हिंदी - हिंदु, उर्दू को मुसलमान बना देता है। मै तो साहब छोटा-सा शायर हूँ, हर इंसान मे हिन्दोस्तान दिखाई देता है। सेज से स्वरो से अपने वो तोडता रहता है, कलम चलाकर कवि टुकी लगाता रहता है। वहसियो कितना बाँटोगे, मिलना किसी शायर से इक गजल मे आज भी वो सारा हिन्दोस्तान लिखता है। लाख चाह लो, लाख मना लो, ना तोड पाओगे, जब तक भी कबीर का इक वंशज जिंदा है।