ख्वाब जलाकर सुकून से कौन सो पाता है
चाहकर भी महबूब से रूसवा कौन होे पाता है।
आंखों की तिलस्मी जेल मे बंद परिंदा
बज्म-ए-इश्क से आजाद कब हो पाता है।
फासला मीलो का फरमान तो बहुत सुनाता है
ये दिल फरमानो का गुलाम कब हो पाता है।
मुहब्बत का एक पैमाना बगावत भी है, अब
देखना है 'नेमत' तू बगावती कितना हो पाता है।