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स्पर्श


रात नेह के साथ मुझे स्पर्श किसी का मिलता रहा प्रेम भरा संसर्ग दैवीय शुभाषीश अनवरत चलता रहा। हर भोर के साथ उत्कर्ष मेरा फूलों जैसा खिलता रहा रति की ठिठोली खिलती रही और हर्ष मेरा आसमां छूता रहा।।

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