मां...

तेरे होने पर गुमान है मुझे

तेरे कदमों में मिला जहान है मुझे...


तू सिलसिला है मेरी खुशियों का

तू माफीनामा है मेरी नादानियों का

तू है तो मेरा वजूद है...


मेरे जन्म पर तूने कैसे पीड़ा सही

मेरी उस मुस्कान पर कैसे सब भूल गई

ये मां कर सकती है कोई और नहीं

मां के जैसा इस धरती पर कोई हृदय नहीं...


पत्थर की मूरत में भगवान नहीं हुआ करते

वो मां ही है जिसके जज़्बात कभी कम नहीं हुआ करते...

दुनिया में तमाम बनावटी रिश्ते देखे

वो मां ही है जिसके एहसास कभी ना बदलते देखे...