क्या लिखूँ
जो होने वाला था
हो गया
जो होने वाला है
हो कर रहेगा
तो क्या करुँ?
लम्बी सांस खींच लूँ
मुट्ठीयों को भींच लूँ
तेज़ रक्तचाप हो
और अश्रु भांप हो
और मै लड़ता रहूँ…
स्वयं को स्वयं से बचाने के लिए….
स्वयं ही के हाथों मिटता रहूँ,
लेकिन कब तक
सह सकूँगा?
ऐसे जीवित रह सकूँगा…?
मुख़्तसर ये ज़िन्दगी उस पर इतना ज़ोर क्यों?
सब मांगते है शांति
तो फिर ये इतना शोर क्यों…?
क्या करुँ
क्या लिखूँ………...?
…


