बस्ती बस्ती आते जाते आँखें सारी रोई हैं,
एक तुम्हारे मन पर ही धीरज सारी खोयी हैं,
नंगे नंगे पांवों से जब घर में बच्चा आता है,
ऐसा लगता है कुछ जैसे सूरज ढल सा जाता है,
नर हो या नारीं हो या पशु पक्छियां हो जैसे,
तेरे ही सम्मोहन में प्रिय सारी सुध-बुध खोयी है,
याद का चंदा जब जब आकर हमको नींद जगाता है,
ऐसा लगता है जैसे वो तेरी सुधियाँ लाता है,
जीत गयी तू इस रण में भीं जिसमे आँखें रोई हैं,
एक तुम्हारे मन पर ही धीरज सारी खोयी हैं..!!