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चौखट


सोचता हूँ बैठा रहूँघर की चौखट पर हीऔर ज़िंदगी वहीं गुज़ार दूँ।

ज़रा-सी हरकत भी अबमुझे अंदर से तोड़ जाती है।

बाहर जाने की सोचता हूँतो पिता याद आते हैं,

अंदर जाने की सोचता हूँतो माँ याद आती है।

— सौरभ तिवारी
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