सोचता हूँ बैठा रहूँघर की चौखट पर हीऔर ज़िंदगी वहीं गुज़ार दूँ।ज़रा-सी हरकत भी अबमुझे अंदर से तोड़ जाती है।बाहर जाने की सोचता हूँतो पिता याद आते हैं,अंदर जाने की सोचता हूँतो माँ याद आती है।
सोचता हूँ बैठा रहूँघर की चौखट पर हीऔर ज़िंदगी वहीं गुज़ार दूँ।
ज़रा-सी हरकत भी अबमुझे अंदर से तोड़ जाती है।
बाहर जाने की सोचता हूँतो पिता याद आते हैं,
अंदर जाने की सोचता हूँतो माँ याद आती है।