ज़ुल्फ़ें ही तो बिखरायी थी उफ़्फ़! रात सी घिर आयी थी निगाहें उसे तकती रही देर तक और मदहोशी सी छायी थी तेरी तस्वीर आँखों में हर पल रग-२ में बस तू समाई थी तेरी छुहन जैसे हाथ मेरे हाथों मेंशायद ये कोई नयी रूत आयी थी रूख पर ख़ुशी भी थी, हंसी भी उल्फत में इतनी पारसाई थी पास आए वो मगर कुछ इस तरहजैसे गुलिस्ताँ में बहार आयी थी महक उठी ज़िंदगी, उनकी ज़ुल्फ़ों मेंइश्क़ की बूँदें जो छिड़कायी थी साँझ होने लगी अहिस्ता अहिस्ता फिर वो कली क्यों मुरझायी थी फ़रियाद करती रही निगाहें मगरघड़ी विसाल का संदेसा लायी थीहाथ मिलाया, फिर मिलने की आस में छोड़ते हुए अंगुलियां कुछ घबराई थी पूछ डाला कंपकपी का सबब जबयकलख्त मेरी आंख भर आयी थी अश्क़ थम से गये, जाने क्या सोच करशायद बादलों के बीच तेरी सूरत नज़र आयी थीहंस कर जैसे ही बढ़ाया था कदमो को चांदनी बिखर कर बाहों में समाई थीरुक कर कदम वापस चलने लगे उस बज़्म में जो तेरी बुलाई थीएक तुम और मैं ही थे गुफ्तगू- ए - वस्ल के सिवाऔर दास्तान- ए - उल्फत, जो बस खुद को सुनाई थी