ज़िन्दगी बेनूर सी क्यों जैसे आशना दूर जाने लगा रंजिश नहीं न ही कोई रंज है दिल में न जाने कौन मुझे आज़माने लगा सुन रहा हूँ मैं मगर क्या शोर बहुत है रोका था रुका नहीं शायद ज़ोर बहुत है अँधेरे में सूना आँगन डर बहुत लगता है खुद के साये में कोई और नज़र आने लगा चलो अच्छा है साये का साथ अँधेरे में रहता है पास अब सवेरा न हो, अँधेरे में है उसके साथ की आस लेकिन ये क्या आसमान रोशन नज़र आने लगा साया गायब हुआ, ज़िन्दगी का हर्फ़ बदला नज़र आने लगा कहाँ खो गयी वो नवाज़िश, या हम ही ख़्वाबीदा थे क्यों साथ चलने वाला मुख्तलिफ राह जाने लगा वस्ल है लेकिन मुझ से अब वाबस्ता नहीं ज़िन्दगी का ये रक्स जाना पहचाना लगा अब भी आफरीन है साये का साथ जब से साये में वो नज़र आने लगा