
ज़िन्दगी बेनूर सी क्यों
जैसे आशना दूर जाने लगा
रंजिश नहीं न ही कोई रंज है दिल में
न जाने कौन मुझे आज़माने लगा
सुन रहा हूँ मैं मगर क्या शोर बहुत है
रोका था रुका नहीं शायद ज़ोर बहुत है
अँधेरे में सूना आँगन डर बहुत लगता है
खुद के साये में कोई और नज़र आने लगा
चलो अच्छा है साये का साथ अँधेरे में रहता है पास
अब सवेरा न हो, अँधेरे मे
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