हर कोई चला आता है सिवा तेरे
एक काम कर तू मुझे वीरान कर दे
फिर कभी आकर मुझे हरा भरा कर देना
इश्क़ के मोजसे से सबको हैरान कर दे
जो मैं तुमसे कहता हूँ कोई और क्यों कहे
लफ़्ज़ों के बाज़ार को तू सुनसान कर दे
ये हवा मचलती है मगर तुझे क्यों छूती है
आ भी जा अब मुझे अपना मकान कर दे
गुलाब जो मेरे दिल में खिलता है कौन है
अब चुप रहूँ तो ये ज़माना परेशान कर दे
ये भी तो ना धड़केगा तेरी ख़ुशबू के बिना
जानता सब हूँ मगर मुझे अनजान कर दे
ज़िंदगी के सफ़र की मौत ही तो है मंज़िल
तू बस इतना कर ये सफ़र आसान कर दे