कुछ ऐसी लाश हैं जिनपर कफ़न नहीं होता
हर एक रूह के हिस्से बदन नहीं होता
तुम इसे शेर पुकारों, मगर इतना समझो
हर एक लफ्ज़ का टुकड़ा सुखन नहीं होता
इसकी बुनियाद में कुछ बात यक़ीनन होगी
वरना फौलाद यूँ अपना वतन नहीं होता
अपनी मर्ज़ी से मैं करता हूँ वतन को सजदे
नोक-ए-तलवार पर हमसे नमन नहीं होता
यूँ करो गैर के ज़ख्मो पे लगाओ मरहम
तुमको हासिल अगर चैन-ओ-अमन नहीं होता