अपनी आँखों में तेरे ख्वाब सजाने वाले
हम वही हैं तुझे टूट के चाहने वाले
हाथ में है जो अभी बात बिगड़ने मत दो
चल दिए हम तो नहीं लौट के आने वाले
कल यही लोग मेरे दास्ताँ पे रोयेंगे
कहकहे अब मेरी आहों पे लगाने वाले
तर्क-ए-तालुक़ का तकल्लुफ तो निभा कर जाते
बीच मंझदार में यूँ छोड़ के जाने वाले
बाद मरने के, मसीहा भी बना देते हैं
कितने अच्छे हैं, ये सूली पे चढ़ाने वाले