आख़िरी ख़त भी जला दोगे क्या
जान, तुम मुझको भुला दोगे क्या
पास सब कुछ है इक सिवा तेरे
इससे बढ़कर भी सजा दोगे क्या
बाद तेरे ये बेवजह ही रही
मुझको जीने की वजह दोगे क्या
एक मुद्दत से मैं हँसा भी नहीं
जान इक बार रुला दोगे क्या
ये जो तूफ़ान लिए बैठे हो
अपने अन्दर ही दबा दोगे क्या
मेरी औकात बतानी है मुझे
मुट्ठी भर ख़ाक उड़ा दोगे क्या