मैं कभी कहीं भी रहता हूँ,
बहुधा यह सोचा करता हूँ,
तुम आती ना जो जीवन में,
बसती ना मेरे चितवन में,
तो क्या मैं यही होता?
ना बसती तुम आँखों में,
मधुवन की सुगंध सी सांसों में,
धड़कन भी मेरी रुक-रुक कर,
तुम्हें पुकारती ना पल-पल,
तो क्या मैं यही होता?
जगाती ना सोये सपनों को,
चहुँ ओर ना भरती रंगों को,
मुस्का कर ना मुझे रिझाती तुम,
पाठ प्रेम का ना जो पढ़ाती तुम,
तो क्या मैं यही होता?
निःस्संग ना मुझको कर जाती,
वेदना एकाकी में ना भर जाती,
नयनों के आँसू को पीकर,
हँसता ना जो मैं कल-कल,
तो क्या मैं यही होता?
स्मृतियों में ना आती अगर,
दिए ना जलती डगरों पर,
अंधेरों में जो भटक जाता,
स्वयं को ही तरस जाता,
तो क्या मैं यही होता?


