चंचल-चंचल कलकल-कलकल,
निर्मल-निर्मल कोमल-कोमल।
बचपन के वो याद सुहाने,
मनन करूं मैं शयन के बहाने।
मधुर स्मृति की कविता सी कहती,
निश्छल प्रेम की धारा बहती।
शादी वह गुड्डे गुड़ियों की,
किस्से वे राजा परियों की।
रोना बिलखना हठ वो करना,
रोते-रोते सहस हॅंस देना।
यारों से भी खूब झगड़ता,
सरपट पगडंडियों पे दौड़ता।
पेड़ की छाँव में छिप जाता,
या खेत के फसलों में खो जाता।
कहाँ गया वह बचपन सलोना,
जब मैं सबका था खिलौना।
चाचा की उॅंगली पकड़ टहल,
चाची के गाल को चूम मचल।
दादी की गोदी में उछलता,
दादा के आश्रय में रहता।
मामा, मौसी, नाना-नानी,
रोज सुनाए एक कहानी।
दौड़ के बापू से जा लिपटता,
नए खिलौने की विनती करता,
फिर उनके कॅंधे पे चढ़कर,
प्यारी-प्यारी बातें करता।
माँ के आँचल की वो चाशनी,
या उनकी थपकी की सम्मोहिनी।
नन्हे नन्हे हाथों से फिर,
माँ के कपोलों को मैं छूता,
भूख लगी है-भूख लगी है,
माँ खाना दो! कह कर रोता।
नहीं चाहिए मुझको तकिया,
नहीं चाहिए गद्दा कोई,
माँ गोद को बनाती मेरा बिछावन,
आँचल को बनाती मेरी रजाई।
सोते से जब भी उठ जाता,
सारे घर में हल्ला फिर मचता।
सभी दौड़ते पास में मेरे,
छिन भर में बँध जाते घेरे।
स्मरण में जब वो क्षण आते हैं,
दृगंचल पे अश्रु लुढ़क आते हैं।
वो दिन भी थे कितनी सच्चे,
काश हम अब तक होते बच्चे।
स्मृतियों को सहेज सजवाऊँ,
ऐसा मुझको एक धाम बनवा दो,
मेरी सारी सुख-सम्पत्ति के बदले,
मेरा वह बचपन लौटा दो।

