जितना देखूं कम ही लगता है,
ये मकां मुझे मेरे घर सा लगता है।
ढूंढता हूँ चेहरों पर लिखावटें अक्सर,
हर चेहरा मुझे किसी कहानी सा लगता है।
थककर बैठ जाता हूँ रास्तों में अक्सर,
हर रस्ता मुझे हमसफ़र सा लगता है।
वो जो मुझे देखकर भी अनदेखा कर रहा है,
वो शख्स मुझे मेरा चाहने वाला लगता है।
घबरा रहा है बाहर के शोर शराबे से,
ये शख्स मुझे शहर में नया सा लगता है।
संभल संभल कर चल रहा है,
ये राही इस रस्ते पर मुझे नया सा लगता है।
थामा जबसे है तुमने हाथ मिरा,
ये सफर मुझे आसां सा लगता है।
-सौरभ राणा
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