सूर्य का दिव्य प्रकाश हु
रन्भुमि का मैं त्रास हु
हर स्त्री का अभिलाष हु
मैं नियति का परिहास् हु
रहा वहीं था छ्ल् जहां
ऋण के लिए सब सहा
अनुजो को अपशब्द कहा
भीतर मेरे सिर्फ अश्रु बहा
पान्चालि से हुआ अन्याय हु
पीड़ित का मैं न्याय हु
कद में तो अतिकाय् हु
मैं मित्रता का पर्याय हु
युद्ध में मैं खूब लड़ा
पान्दवो में भय भरा
गर्जन् से मेरी कॉपी धरा
सामने था रन्छोर् खड़ा
विजय धनुष का तन्कार् हु
मैं पूर्ण और साकार हूँ
निर्बल का मैं अधीकार् हूँ
मैं अधर्मी का प्रतिकार् हूँ
देवो ने आशीष दिया
गुरु ने श्रापित् किय
काल तब विकट आया
मृत्यु जब निकट आया
तुनिर् से निकला वां हु
कौरवो का अभिमान हूँ
निर्धन के लिए त्रान् हु
मैं स्वयम ही एक दान हु
रथ का पहिया धस गया
धनुष भी मेरा फस गया
संग्राम मेरा समाप्त हुआ
मैं वीरगति को प्राप्त हुआ


