सर पर मंडराया जब कोरोनारुपी बादल का गहरा साया
जीवन का मोल तब भी क्या हमें समझ आया
मौत आज विकराल बनके पास हमारी आ ख़डी है
इंसानी नस्ल के लिए इम्तिहान् की यह कड़ी है
अहंकार के वाहन पे सवार् हम दौड़ चलें थे
मत्त्त् थे इतने गति में रास्ता ही दिखा नहीं
सफर को ही मंज़िल समझ के चल पड़े थे
मोड़ मुश्किल एक आया पार करना हि सीखा नहीं
धर्म और मज़हब् को लेकर जो लड़ रहे थे
पूछो क्या उन्होने वैद्य् के कपड़े का रंग देखा
मौत का शिकनजा जब फेफड़ों को कस रहा था
सोचा बचने को या ज़ेहन् में आयी कोई रेखा
धर्म के ठेकेदारो ने नफ़रत की जो आग फैलाई है
अपने कौम को बचाने की मुहीम जो चलायि है
पूछो क्या मौत मजहब पूछ के आज दस्तक देगी
आयी वो अगर ना मरघट ना कब्र नसीब होगी
आपसी रंजिश में डूब कर ख़रीदा हमने खूब हथियार
जीवन के रण के लिए औज़ार् कोई बचाया नहीं
मंदिर मस्जिद के नाम पर चुनि हमने खुद सरकार
और रोरहे आज फिर की अस्पताल कोई बनाया नहीं
इंसानियत ही एक धर्म था यह नहीं हमने जाना
मदद जीवन का मर्म था यह नहीं हमने माना
हमारे कर्मो का परिणाम आज मुसल् बनके बरस रहा
हवा चार तरफ पर इंसान आक्सिजेन् को तरस रहा
भुलके पिछ्ला कल सबको अब साथ आना है
जीवन् का मोल समझ के मौत को आज हराना है
इंसानियत के पथ पे चल बिजय्श्री हमको पाना है
हैवान् नहीं इंसान हम अब आखिर यह बताना है


