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Kabir


कबीर

अरे गाड़ी अटकी रेत में, भई मजल बड़ी है दूरधर्मी धर्मी पार उतरगया, अन पापी चकना चूर

जरा धीरे धीरे हको मोरे राम गड़ीवला

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