ओ मधु :
जो खड़े हुए गिरते-उठते,
विह्वल कपोल कंठ पाते,
फटती सूखी वाणी अर्थक,
जिनके स्वर धूमिल हो जाते।
उनको नव विश्वास,चेतनता दे दो;
तनिक शेष मादकता दे दो।
तनिक शेष मादकता दे दो।।
टूटी तिर्यक सीढ़ी श्रृंख पर,
चढ़-चढ़ कर परिछाई हारी,
पड़ रहीं तपी हथेली शीतल,
सूरज की तपती तिरपारी।
छांह पत्र बन तरु कोंपलता दे दो;
तनिक शेष मादकता दे दो।
तनिक शेष मादकता दे दो।।
जुगनू के अरे बैठ भरोसे,
जो निकल पड़े नक्शों पर,
थक हार हाथ की रेखा पर,
हट खड़े पुराने बख्तों पर।
ओ पलाश : पथ प्रभा अधिकता दे दो;
तनिक शेष मादकता दे दो।
तनिक शेष मादकता दे दो।।


