रागनी के गुफ्तगू में,अब जुगनू नजर नही आते।
दिन के उजालो में अब पंछी कही खो जाते।।
समझ नही आता कैसे कहुँ मै? हूँ,उसी मही पर,
जहां आतेे दिनकर की रोशनी भी दूषित हो जाते।


रागनी के गुफ्तगू में,अब जुगनू नजर नही आते।
दिन के उजालो में अब पंछी कही खो जाते।।
समझ नही आता कैसे कहुँ मै? हूँ,उसी मही पर,
जहां आतेे दिनकर की रोशनी भी दूषित हो जाते।